ज्योतिष शास्त्र: दिव्य चक्षु

Moksh Yogi
08.01.26 03:46 AM - Comment(s)

"होनी को कौन टाल सकता है?"

यह लोकोक्ति हम अक्सर सुनते हैं। लेकिन हमारे ऋषियों ने एक और प्रश्न भी खड़ा किया—"यदि होनी को टाला नहीं जा सकता, तो फिर कर्म, पुरुषार्थ और ईश्वर की भक्ति का औचित्य क्या है?"

यहीं पर ज्योतिष शास्त्र का प्रवेश होता है। यह शास्त्र हमें 'होनी' का ज्ञान करवाता है ताकि हम 'अनहोनी' से बच सकें और अपने 'वर्तमान' को सुधार सकें। आज के इस ब्लॉग में हम शास्त्रों के आलोक में ज्योतिष के वास्तविक अर्थ और मानव जीवन में इसके महत्व को समझेंगे।


1. ज्योतिष का शाब्दिक और तात्विक अर्थ (The Meaning)

सामान्य भाषा में लोग ज्योतिष को केवल "ग्रह-नक्षत्रों की विद्या" मानते हैं, लेकिन इसका अर्थ इससे कहीं गहरा है।

संस्कृत व्याकरण के अनुसार, 'ज्योतिष' शब्द 'द्युत' (दीप्तौ) धातु से बना है, जिसका अर्थ है—प्रकाश (Light)। अतः ज्योतिष का अर्थ है—"वह विद्या जो अंधकार में प्रकाश दिखाए।"

जिस प्रकार अंधेरे कमरे में रखी वस्तुएं हमें दिखाई नहीं देतीं, और हम उनसे टकराकर गिर सकते हैं, उसी प्रकार 'भविष्य' के गर्भ में क्या छिपा है, यह हमारे लिए अंधकारमय है। ज्योतिष वह टॉर्च (Searchlight) है, जो काल के उस अंधकार को भेदकर हमें रास्ता दिखाता है।

आचार्य लल्लाचार्य ने 'शिष्यधीवृद्धिद' में इसे परिभाषित किया है:

"ज्योतिषां ग्रहादीनां बोधकं शास्त्रं ज्योतिषम्।"(अर्थात: जो शास्त्र आकाशीय ज्योतिर्पिण्डों (ग्रह, नक्षत्र, धूमकेतु) की गति, स्थिति और उनका पृथ्वी पर पड़ने वाले प्रभावों का बोध कराए, वह ज्योतिष है।)


2. वेद का नेत्र: ज्योतिष का महत्व (Importance as Veda-Chakshu)

भारतीय संस्कृति में वेदों को सर्वोच्च ज्ञान माना गया है। वेदों के अर्थ को समझने के लिए 6 वेदांग (Vedangas) बनाए गए, जिनमें ज्योतिष को 'नेत्र' (आंखें) कहा गया है।

"यथा शिखा मयूराणां, नागानां मणयो यथा।तद्वद् वेदांगशास्त्राणां, ज्योतिषं मूर्धनि स्थितम्।।"(वेदांग ज्योतिष)

अर्थ: जिस प्रकार मोरों में शिखा (कलगी) और नागों में मणि सर्वोच्च स्थान पर सुशोभित होती है, उसी प्रकार सभी वेदांगों में ज्योतिष शास्त्र का स्थान 'मूर्धा' (सिर/शीर्ष) पर है।

भास्कराचार्य ने 'सिद्धान्त शिरोमणि' में बहुत कड़ा सत्य लिखा है:

"वेदस्य चक्षुः किल शास्त्रमेतत्, प्रधानताङ्गेषु ततोऽर्थजाता।अंगैर्युतोऽन्यैः परिपूर्णमूर्तिः, चक्षुर्विहीनः पुरुषो न किञ्चित्।।"

भावार्थ: ज्योतिष वेद की आंखें हैं। यदि किसी पुरुष (वेद पुरुष) के पास हाथ, पैर, कान, नाक सब हों, लेकिन 'आंखें' न हों, तो वह 'अंधा' होकर भटक जाएगा। उसी प्रकार, बिना ज्योतिष (काल ज्ञान) के सारे यज्ञ, अनुष्ठान और कर्मकांड निष्फल हैं, क्योंकि वे सही समय पर नहीं किए गए।


3. कर्म और भाग्य का दर्पण (Mirror of Karma)

अक्सर आलोचक पूछते हैं—"क्या ज्योतिष हमें भाग्यवादी (Fatalist) बनाता है?" शास्त्र कहते हैं—नहीं! ज्योतिष हमें कर्मवादी बनाता है।

महर्षि पराशर कहते हैं कि कुंडली में बैठे ग्रह कोई जादूगर नहीं हैं, वे तो केवल आपके 'संचित कर्मों' के पोस्टमैन (डाकिया) हैं।

"अवतारानिकान्येषां अजस्य परमात्मनः।भूतानां कर्मफलदः ग्रहरूपी जनार्दनः।।"(बृहत् पराशर होरा शास्त्र)

अर्थ: ये ग्रह साक्षात भगवान विष्णु (जनार्दन) के अवतार स्वरूप हैं, जो प्राणियों को उनके पूर्व में किए गए कर्मों का फल देने के लिए नियुक्त हैं।

जैसे दर्पण (Mirror) आपके चेहरे के दाग को केवल 'दिखाता' है, उसे पैदा नहीं करता। उसी प्रकार, ज्योतिष शास्त्र आपके प्रारब्ध को केवल दिखाता है। दाग को साफ़ करना (कर्म और उपाय करना) आपके हाथ में है।


4. जीवन में ज्योतिष की उपयोगिता (Utility in Life)

लोकोक्ति है—"अब पछताए होत क्या, जब चिड़िया चुग गई खेत।" ज्योतिष का उद्देश्य ही यह है कि चिड़िया के खेत चुगने से पहले आपको सावधान कर दिया जाए।

क) निर्णय लेने में सहायक (Decision Making)

व्यापार कब शुरू करें? विवाह कब करें? यात्रा कब करें? आचार्य वराहमिहिर 'बृहत्संहिता' में कहते हैं:

"अप्रदीपो यथा रात्रौ, अनादित्यं यथा नभः।तथासांवत्सरो राजा, भ्रमत्यन्ध इवाध्वनि।।"

(जैसे बिना दीपक के रात और बिना सूर्य के आकाश अंधकारमय होता है, वैसे ही बिना ज्योतिषी (मार्गदर्शक) के राजा (या व्यक्ति) जीवन रूपी मार्ग में अंधे की तरह भटकता है।)

ख) आपदा प्रबंधन (Crisis Management)

यदि हमें पता हो कि "बारिश होने वाली है", तो हम उसे रोक नहीं सकते, लेकिन "छाता" लेकर तो निकल सकते हैं। ज्योतिष यही छाता प्रदान करता है। ग्रहों की दशा यह बताती है कि कब धैर्य रखना है और कब आक्रामक होकर कार्य करना है।

ग) आध्यात्मिक उन्नति (Spiritual Growth)

ज्योतिष यह बता देता है कि हम 'अमर' नहीं हैं और न ही 'सर्वशक्तिमान' हैं। जब व्यक्ति शनि की साढ़ेसाती या राहु के प्रभाव को देखता है, तो उसका अहंकार (Ego) टूटता है और वह ईश्वर की शरण में जाता है।


5. दैव (भाग्य) और पुरुषार्थ (कर्म) का संतुलन

याज्ञवल्क्य स्मृति में बहुत सुंदर बात कही गई है:

"यथा ह्येकेन चक्रेण न रथस्य गतिर्भवेत्।एवं पुरुषकारेण विना दैवं न सिध्यति।।"(याज्ञवल्क्य स्मृति 1.351)

अर्थ: जैसे एक पहिये से रथ नहीं चल सकता, वैसे ही पुरुषार्थ (Hard Work) के बिना भाग्य सिद्ध नहीं होता। ज्योतिष वह 'दूसरा पहिया' है। यदि आपको अपने भाग्य का पता है और आप तदनुसार पुरुषार्थ करते हैं, तो सफलता सुनिश्चित है।


निष्कर्ष: अंधविश्वास नहीं, आत्म-विज्ञान

अंत में, हमें यह समझना होगा कि ज्योतिष का उद्देश्य भयभीत करना नहीं, बल्कि सचेत करना है। यह एक 'जीपीएस' (GPS) की तरह है जो बताता है कि आगे 'ट्रैफिक जाम' है, आप रास्ता बदल लें।

मोक्षयोगी का प्रयास यही है कि हम इस पवित्र विद्या को "टोने-टोटकों" से बाहर निकालकर इसे पुनः "वेद चक्षु" के रूप में स्थापित करें।

"तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय! युद्धाय कृतनिश्चयः।" गीता के इस उपदेश की तरह, ज्योतिष हमें अपना प्रारब्ध जानकर कर्म युद्ध के लिए तैयार करता है।


शुभम् भवतु।

द्वारा: मोक्षयोगी

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